Monday, July 27, 2015

मेरी तरबियत पर उंगली वो शख्श क्या उठाएगा I सुना है माँ बाप उसके दारुज़ईफ़ों में रोया करते हैं II

मेरी तरबियत पर उंगली वो शख्श क्या उठाएगा I सुना है माँ बाप उसके दारुज़ईफ़ों में रोया करते हैं II

Himani Sharma

ज़मीन अपनी है, जहां अपना है I

ज़मीन अपनी है, जहां अपना है I 
एक मुट्ठी भर आसमान अपना है II 
जुबां तुम्हारी ,अलफ़ाज़ हो मेरे ,
फखत इस दिल का अरमान इतना है II

HIMANI SHARMA 

इंसान कितना गिर जाता है

खुदा को हाज़िर नाज़िर मान,
बड़ी बड़ी कस्मे वो खा जाता है I 
हैरान हूँ मैं कुछ ऐब छिपाने को ,
इंसान कितना गिर जाता है II

HIMANI SHARMA

Thursday, July 9, 2015

बहुत कुछ कहना चाहा उसने

बहुत  कुछ  कहना  चाहा  उसने और  कहा  भी  था  एक  बार l
तेरे  साथ  मिले  गर  ज़िंदगी  मैं  जी  जाऊं   सौ  सौ  बार ll
पर  वक़्त  था  कुछ  ऐसा  जब  जब  मैंने  हाथ  बढ़ाया  है l
हर  बार  गलत  फहमियां थीं , कभी   उस  पार  कभी  इस  पार ll  

waqt ki raftaar

सैलाब-ए-समंदर आँखों में.
लब पर हर पल मुस्कान नयी ,
रफ़्तार जो वक़्त पकड़ता है,
सपने धुंधला जाते हैं कई .

kuch khamosh rishte

Kaise Haq Jataate Un Par,
Kya Kehte Hum Kaun Hain Unke,
Kuch Khamosh Rishte Naam ke kitna mohtaaz h
o jaate hain.

Bahut kuch kehna chaaha usne,,

Bahut Kuch Kehna Chaaha Usne or Kaha Bhi Tha Ek Baar,
Tere Saath Mile Gar Zindgi Main Jee Jaau Sau Sau Baar,
Pr Waqt Tha Kuch Aisa Jab Jab Maine Haath Badhaya Hai,
Har  Baar Galat Fehmiyaan Thin, Kabhi  us Paar Kabhi is Paar.